गहने गिरवी रख खेती को आधुनिक बनाया, अब सरकारी भुगतान का इंतजार
गोरखपुर: राष्ट्रीय बागवानी मिशन योजना के तहत सरकारी तंत्र की घोर लापरवाही का खामियाजा अन्नदाताओं को भुगतना पड़ रहा है। गोरखपुर और बस्ती मंडल के करीब 352 किसानों की 2.42 करोड़ रुपये की सब्सिडी पिछले दो सालों से सिस्टम की फाइलों में दबी हुई है। इस संकट का सबसे बड़ा शिकार गोरखपुर, सिद्धार्थनगर, बस्ती और कुशीनगर जिले के किसान हुए हैं, जिन्होंने अधिकारियों के खोखले वादों और भरोसे पर महंगे कृषि यंत्र खरीद तो लिए, लेकिन आज तक उनके बैंक खातों में सब्सिडी की फूटी कौड़ी भी नहीं पहुंची।
क्या है पूरा मामला? लक्ष्य से 3 गुना ज्यादा करवाई खरीद
यह मामला साल 2024 का है, जब शासन की ओर से राष्ट्रीय बागवानी मिशन योजना के अंतर्गत सब्सिडी वाले कृषि यंत्रों का एक सीमित लक्ष्य तय किया गया था। इस योजना के तहत:
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पॉवर टिलर (8 HP से ऊपर): 75 हजार रुपये की सब्सिडी
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पॉवर टिलर (8 HP से कम): 50 हजार रुपये की सब्सिडी
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ट्रैक्टर: 1 लाख रुपये की सब्सिडी दी जानी थी।
उद्यान विभाग के अति-उत्साही अधिकारियों ने जमीन पर बजट देखे बिना लक्ष्य से तीन गुना ज्यादा कृषि यंत्र खरीदने का प्रस्ताव बनाकर शासन को भेज दिया और वहाँ से इसे हरी झंडी भी मिल गई। जनवरी 2025 में अधिकारियों ने किसानों पर दबाव बनाकर खरीदारी करवा ली। जब बिल-वाउचर के सत्यापन के बाद फाइलें लखनऊ भेजी गईं, तो शासन ने 'बजट की कमी' का हवाला देकर भुगतान पर पूरी तरह रोक लगा दी।
भुगतान का गणित: जानिए कहां कितने किसान हुए परेशान
नीचे दी गई तालिका से साफ है कि किस तरह जिलों में भारी संख्या में किसानों की गाढ़ी कमाई फंसी हुई है:
| जिला | फंसे कृषि यंत्रों की संख्या | अटकी हुई राशि (लाख रुपये में) |
| सिद्धार्थनगर | 136 | 92 लाख |
| गोरखपुर | 130 | 84 लाख |
| कुशीनगर | 66 | 51 लाख |
| बस्ती | 20 | 15 लाख |
| कुल योग | 352 | 2.42 करोड़ |
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सिद्धार्थनगर का हाल: यहाँ 109 बड़े पावर टिलर खरीदे गए, जिनमें से सिर्फ 33 को पैसा मिला। 10 ट्रैक्टर खरीदे गए, लेकिन किसी एक को भी सब्सिडी नहीं मिली।
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बस्ती और कुशीनगर की स्थिति: बस्ती में 20 किसानों ने पावर टिलर खरीदे, पर भुगतान शून्य रहा। कुशीनगर में 85 में से केवल 19 किसानों को ही राशि नसीब हो सकी।
पीड़ित किसानों की दर्दभरी दास्तान
"पत्नी के जेवर बंधक रख दिए""सब्जियों की अच्छी खेती के लिए मुझे पावर टिलर की जरूरत थी। जनवरी 2025 में अधिकारियों के लिखित आश्वासन पर मैंने पत्नी के सोने के जेवर गिरवी रखकर मशीन खरीदी थी। दो साल से सिर्फ चक्कर काट रहा हूँ। आईजीआरएस (IGRS) पोर्टल पर शिकायत की तो जवाब मिला कि बजट ही नहीं है। कर्ज के चलते भारी मानसिक तनाव में हूँ।"
— अनूप कुमार मिश्रा (किसान, गोला-गोरखपुर)
"सब्सिडी के चक्कर में कर्जदार बन गए""उद्यान विभाग ने बकायदा कागजों का वेरिफिकेशन करके मुझसे कहा कि आप मशीन खरीद लें, दो महीने में 50% पैसा खाते में आ जाएगा। मैंने ब्याज पर उधार लेकर डेढ़ लाख की मशीन उठाई। अब न सब्सिडी आ रही है और न कर्ज उतर रहा है।"
— सर्वेश मिश्रा (किसान, गोला-गोरखपुर)
जिम्मेदार अधिकारियों का क्या है कहना?
"साल 2024-25 में कई जिलों में तय लक्ष्य से अधिक कृषि यंत्रों की खरीद हो गई थी। इस योजना में भारत सरकार की ओर से मिलने वाला 60 प्रतिशत अनुदान का हिस्सा नहीं मिल पाया। अब प्रभावित किसानों को किसी दूसरी सरकारी योजना में शिफ्ट करके उनका भुगतान कराने का रास्ता निकाला जा रहा है।"
— भानु प्रकाश राम, निदेशक (उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग, यूपी)
"लक्ष्य से अधिक खरीद का प्रस्ताव शासन स्तर से ही स्वीकृत हुआ था। हमारी तरफ से कोई ढिलाई नहीं है, किसानों के फंसे हुए भुगतान को जारी करने के लिए लखनऊ मुख्यालय को कई बार रिमाइंडर (स्मरण पत्र) भेजे जा चुके हैं।"
— पारसनाथ, अधीक्षक (जिला उद्यान विभाग)
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