सावन में क्यों नहीं खाई जाती कढ़ी? जानें इसके पीछे की धार्मिक मान्यता और वैज्ञानिक कारण
सावन का महीना भगवान शिव की भक्ति, व्रत और सात्विक जीवनशैली के लिए जाना जाता है. इस पूरे महीने लोग अपने खानपान को लेकर खास सावधानी बरतते हैं. कई घरों में प्याज-लहसुन और मांसाहार से तौबा करने के साथ-साथ सावन में कढ़ी-चावल खाने से भी परहेज किया जाता है. ऐसे में अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर सावन में कढ़ी क्यों नहीं खाई जाती. क्या यह सिर्फ एक धार्मिक मान्यता है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक कारण भी है. आइए जानते हैं इन्हीं सवालों के जवाब.
कढ़ी न खाने के पीछे धार्मिक मान्यता
ऋषिकेश के ज्योतिषी अखिलेश पांडेय ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन भगवान शिव का सबसे प्रिय महीना है. इस दौरान शरीर और मन दोनों की शुद्धता पर सबसे ज्यादा जोर दिया जाता है, इसलिए हमेशा सात्विक, ताजा और हल्का भोजन करने की सलाह दी जाती है. कढ़ी मुख्य रूप से दही से बनाई जाती है और दही का स्वाद हल्का खट्टा होता है. मान्यता है कि सावन के पवित्र महीने में खट्टी चीजों का सेवन कम से कम करना चाहिए ताकि व्रत और पूजा-पाठ के नियमों का पूरी शुद्धता से पालन हो सके.
कढ़ी न खाने के पीछे वैज्ञानिक कारण
आयुष डॉक्टर राजकुमार ने इसके पीछे का वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक नजरिया साझा किया. उन्होंने बताया कि बरसात के मौसम में हवा में नमी के कारण बैक्टीरिया और फंगस बहुत तेजी से पनपते हैं. इस मौसम में दूध और दही जैसी डेयरी चीजें बहुत जल्दी खराब होने लगती हैं. ऐसे में अगर दही से बनी कढ़ी ताजी न हो, तो उसे खाने से पेट में इंफेक्शन का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ जाता है.
इसके अलावा, आयुर्वेद के अनुसार बरसात में इंसानी शरीर की पाचन शक्ति मेटाबॉलिज्म काफी कमजोर हो जाती है. इस मौसम में बहुत अधिक खट्टा, भारी या देर का रखा हुआ खाना खाने से पेट में गैस, अपच, एसिडिटी और पेट दर्द जैसी परेशानियां शुरू हो सकती हैं. यही वजह है कि बुजुर्गों ने भी सावन के महीने में कढ़ी खाने की मनाही की थी और इस मौसम में केवल हल्का, ताजा और आसानी से पचने वाला भोजन ही खाने की सलाह दी जाती है.
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