माहरंग बलूच को उम्रकैद की सजा, पाकिस्तान की मुश्किलें हुईं दोगुनी
क्वेटा/इस्लामाबाद: बलूचिस्तान में मानवाधिकारों और स्थानीय अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाली 'बलूच यकजेहती कमेटी' (BYC) की प्रमुख नेता माहरंग बलूच और उनके साथी कार्यकर्ताओं को पाकिस्तान की एक आतंकवाद रोधी अदालत द्वारा उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद पूरे प्रांत में भारी उबाल है। इस फैसले के विरोध में बुधवार को बलूचिस्तान के कोने-कोने में ऐतिहासिक और पूर्ण चक्का जाम व बंद देखा गया। इस दौरान सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा और बाजार व व्यावसायिक प्रतिष्ठान पूरी तरह ठप रहे। एक तरफ बलूचिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में आंतरिक असंतोष गहराता जा रहा है, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इस न्यायिक फैसले को लेकर पाकिस्तान सरकार और वहां के सैन्य नेतृत्व की कड़ी निंदा शुरू हो गई है।
बंद से पाकिस्तान की आर्थिक रीढ़ पर सीधा असर
क्षेत्रफल के लिहाज से बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, जो प्राकृतिक संसाधनों और रणनीतिक नजरिए से बेहद खास महत्व रखता है। यह क्षेत्र भले ही विकास के मामले में काफी पिछड़ा हो, लेकिन इसे पाकिस्तान की आर्थिक रीढ़ माना जाता है। बलूचिस्तान के सुई इलाके से निकलने वाली प्राकृतिक गैस पूरे पाकिस्तान के घरों और उद्योगों को ऊर्जा देती है, जबकि रेको दिक जैसी जगहों पर सोने और तांबे के विशाल भंडार मौजूद हैं। इस ऐतिहासिक बंद के कारण खदानों में काम रुक गया है और माल की सप्लाई चेन पूरी तरह टूट गई है। जानकारों के मुताबिक, इस बड़े चक्का जाम से आर्थिक तंगी से जूझ रहे पाकिस्तान को हर दिन करोड़ों रुपये का सीधे तौर पर नुकसान झेलना पड़ रहा है, जिससे चीनी निवेश और आंतरिक सुरक्षा पर भी गहरा असर पड़ने की आशंका है।
फ्रंटियर कॉर्प्स अधिकारी की हत्या का मामला और बंद कमरे में सुनवाई
यह पूरा विवाद सोमवार को पाकिस्तान की एक आतंकवाद रोधी अदालत द्वारा सुनाए गए फैसले के बाद शुरू हुआ। स्थानीय मीडिया के अनुसार, यह मामला फ्रंटियर कॉर्प्स के एक सैन्य अधिकारी की कथित हत्या से जुड़ा हुआ था। इस मामले में अदालत ने बीवाईसी की फायरब्रांड नेता माहरंग बलूच, बलूच स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (BSO) के अध्यक्ष बलाच कादिर, केंद्रीय नेता अबू बकर कलांची और बीवाईसी के एक अन्य नेता सिबगतुल्लाह शाह को उम्रकैद की सजा सुनाई है। बीवाईसी ने इस फैसले को पूरी तरह 'अन्यायपूर्ण' और 'राजनीतिक बदले की भावना' से प्रेरित बताया है। संगठन का आरोप है कि क्वेटा जेल के अंदर बंद कमरे में हुई यह सुनवाई पूरी तरह अपारदर्शी थी, जिसका मकसद केवल बलूचिस्तान की लोकतांत्रिक आवाजों को दबाना था।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने जताई गंभीर चिंता
इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी पाकिस्तान की किरकिरी शुरू हो गई है। एमनेस्टी इंटरनेशनल और इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन जैसे वैश्विक मानवाधिकार संगठनों ने इस न्यायिक प्रक्रिया की कड़ी आलोचना करते हुए इसे निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का खुला उल्लंघन बताया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल की दक्षिण एशिया की कार्यवाहक क्षेत्रीय निदेशक इसाबेल लासी ने अपने बयान में कहा कि यह फैसला साफ तौर पर दिखाता है कि पाकिस्तान किस तरह अपने आतंकवाद विरोधी कानूनों का दुरुपयोग कर शांतिपूर्ण ढंग से विरोध दर्ज कराने वाले राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं की आवाजों को कुचलने का प्रयास कर रहा है।
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