स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली, अस्पताल में डॉक्टर नहीं और एंबुलेंस में डीजल तक नहीं
शहडोल। मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य शहडोल जिले के जैतपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की जमीनी हकीकत सरकारी स्वास्थ्य दावों की पोल खोल रही है। करोड़ों रुपये की भारी-भरकम लागत से अस्पताल की चमचमाती और भव्य इमारत तो खड़ी कर दी गई है, लेकिन यहां आने वाले लाचार मरीजों के इलाज के लिए डॉक्टर ही नदारद हैं। आलम यह है कि इस सरकारी अस्पताल में गंभीर रूप से बीमार और चोटिल लोगों का उपचार डॉक्टरों के बजाय वहां तैनात वार्ड बॉय और आउटसोर्स कर्मचारी करते हुए कैमरे में कैद हो रहे हैं। बदइंतजामी की पराकाष्ठा यहीं खत्म नहीं होती, बल्कि प्राथमिक उपचार के बाद जब मरीजों को जिला अस्पताल के लिए रेफर किया जाता है, तो उन्हें परिसर में खड़ी एम्बुलेंस भी नसीब नहीं होती क्योंकि गाड़ियों में डीजल डलवाने तक के पैसे नहीं हैं।
हादसे के शिकार युवक का वार्ड बॉय ने किया प्राथमिक उपचार
जैतपुर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले इस स्वास्थ्य केंद्र की घोर लापरवाही का एक ताजा मामला तब सामने आया, जब गाड़ाघाट लांघा के रहने वाले आनंद यादव एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए। परिजन आनन-फानन में उन्हें उपचार के लिए जैतपुर अस्पताल लेकर पहुंचे। वहां काफी देर तलाशने के बाद भी जब कोई डॉक्टर ड्यूटी पर नहीं मिला, तो लाचारी में वहां मौजूद आउटसोर्स कर्मियों और वार्ड बॉय ने ही उनके जख्मों पर पट्टी बांधकर प्राथमिक औपचारिकता निभाई और उन्हें फौरन जिला अस्पताल ले जाने की सलाह दे दी। इसके बाद गंभीर रूप से तड़प रहे घायल के परिजन घंटों सरकारी एम्बुलेंस मिलने की आस लगाए बैठे रहे, लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने वाहन में ईंधन (डीजल) न होने की बात कहकर पल्ला झाड़ लिया। अंततः परिजनों को भारी परेशानी झेलते हुए एक निजी वाहन का इंतजाम करना पड़ा और वे घायल को जिला मुख्यालय ले गए।
कागजों पर तैनात हैं तीन डॉक्टर, जमीनी हकीकत में ओपीडी बेहाल
इस सुदूर ग्रामीण अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाओं का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां हर दिन करीब 60 से अधिक ग्रामीण मरीज अपनी बीमारियों का इलाज कराने ओपीडी में पहुंचते हैं। सरकारी रिकॉर्ड और ड्यूटी रोस्टर के मुताबिक, यहां डॉ. अभिषेक मिश्रा और डॉ. राधेश्याम सहित कुल तीन योग्य डॉक्टरों की नियमित तैनाती की गई है। हालांकि, स्थानीय ग्रामीणों और मरीजों के तीमारदारों का सीधा आरोप है कि ये डॉक्टर केवल कागजों पर ही अपनी हाजिरी दर्ज कराते हैं और हकीकत में कभी अस्पताल आते ही नहीं हैं। डॉक्टरों की इस लगातार मनमानी के चलते पूरे क्षेत्र के गरीब आदिवासियों के इलाज का पूरा जिम्मा अनुभवहीन चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के भरोसे चल रहा है।
करोड़ों की आलीशान इमारत के बीच भगवान भरोसे स्वास्थ्य सेवाएं
हैरानी की बात यह है कि इस स्वास्थ्य केंद्र में आउटसोर्सिंग के जरिए रखे गए कर्मचारियों और स्थायी स्टाफ की एक लंबी-चौड़ी फौज हर महीने सरकारी खजाने से वेतन उठा रही है, लेकिन मुख्य चिकित्सा अधिकारियों की इस अनुपस्थिति ने समूचे प्रशासनिक तंत्र को पूरी तरह वेंटिलेटर पर ला दिया है। अब क्षेत्र की जागरूक जनता प्रशासन से यह तीखा सवाल पूछ रही है कि जब सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च करके इतनी बड़ी इमारत बनाई है और तमाम संसाधन उपलब्ध कराए हैं, तो फिर आखिर क्यों गरीब और बेसहारा मरीजों को इलाज के लिए इस तरह दर-दर भटकने और निजी गाड़ियों के लिए कर्जदार होने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
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