बंगाल में महिलाओं की बंपर वोटिंग, पुरुषों से 2.5% आगे निकलकर बदली सियासत
बंगाल चुनाव: खामोश मतदाता और रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग, महिला शक्ति ने बदला इतिहास का रुख
पश्चिम बंगाल का वर्तमान विधानसभा चुनाव केवल राजनीतिक नारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने दशकों पुराने चुनावी कीर्तिमानों को ध्वस्त कर दिया है। जहाँ एक ओर तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भाजपा (BJP) सार्वजनिक रूप से अपनी प्रचंड जीत का दावा कर रहे हैं, वहीं भीतर ही भीतर दोनों खेमों में बढ़े हुए मतदान प्रतिशत को लेकर गहरी बेचैनी और गणित का दौर जारी है।
आधी आबादी का 'महासंकल्प': पुरुषों से आगे निकलीं महिलाएं
बंगाल के चुनावी इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले ढाई प्रतिशत अधिक मतदान किया है।
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आंकड़े: इस चुनाव में महिलाओं का मतदान प्रतिशत 93.24% रहा, जबकि पुरुषों का 91.74% दर्ज किया गया।
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व्याख्या: भाजपा इसे 'आरजी कर कांड' के बाद उपजी असुरक्षा और बदलाव की लहर बता रही है। वहीं, टीएमसी का मानना है कि कन्याश्री, रूपाश्री और लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं के लाभ ने महिलाओं को सरकार के पक्ष में 'अभयदान' देने के लिए प्रेरित किया है।
शहरी मतदाताओं की बेमिसाल भागीदारी
आमतौर पर चुनावों के प्रति उदासीन रहने वाला शहरी मतदाता इस बार ग्रामीण मतदाताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चला है।
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नया रिकॉर्ड: आजादी के बाद पहली बार शहरी क्षेत्रों में 90% से अधिक वोटिंग दर्ज की गई है।
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वजह: क्या शहरी मतदाता 'बंगाल अस्मिता' के नारे से प्रभावित थे या वे बेरोजगारी और जनसांख्यिकी बदलाव जैसे भाजपा के आक्रामक मुद्दों की ओर आकर्षित हुए? यह नतीजों के बाद ही साफ होगा।
मतदान विश्लेषण: रिकॉर्ड तोड़ प्रतिशत पर संख्या में कमी?
प्रतिशत के लिहाज से भले ही यह चुनाव ऐतिहासिक रहा हो, लेकिन वास्तविक संख्या के गणित में एक दिलचस्प पहलू सामने आया है:
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वोटों की संख्या: लोकसभा चुनाव की तुलना में इस बार करीब 29.41 लाख कम लोगों ने मतदान किया।
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मतदाता सूची का असर: इसका मुख्य कारण मतदाता सूची में सुधार (SIR) रहा, जिसके चलते कुल मतदाताओं की संख्या में 68 लाख की कमी आई है।
भीतरघात और टिकट वितरण की चिंता
दोनों ही प्रमुख दलों को अपने ही खेमे में असंतोष का डर सता रहा है:
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भाजपा और टीएमसी: दोनों ही दलों में करीब 60-60 सीटों पर उम्मीदवारों के चयन को लेकर कार्यकर्ताओं में नाराजगी की शिकायतें मिलीं।
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नेतृत्व पर निर्भरता: यही वजह रही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, दोनों ने अपनी रैलियों में मतदाताओं से यह अपील की कि वे उम्मीदवार के बजाय सीधे शीर्ष नेतृत्व (स्वयं) को देखकर वोट दें।
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