नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में धर्म और लैंगिक समानता के बीच की लकीर तय करने वाली ऐतिहासिक सुनवाई जारी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 सदस्यीय संविधान पीठ सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के साथ-साथ विभिन्न धर्मों में महिलाओं के साथ होने वाले कथित भेदभाव की व्यापक जांच कर रही है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि अनुच्छेद 25 के तहत 'धार्मिक स्वतंत्रता' के दायरे को नए सिरे से परिभाषित करेगी।

इन 5 संवेदनशील मुद्दों पर टिकी हैं निगाहें

अदालत एक साथ कई अहम कानूनी सवालों का समाधान खोज रही है:

  1. सबरीमाला मंदिर: सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की वैधता।

  2. मस्जिद-दरगाह: मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश का संवैधानिक अधिकार।

  3. पारसी महिलाएं: गैर-पारसी से विवाह के बाद 'अग्नि मंदिर' (Fire Temple) में प्रवेश।

  4. दाऊदी बोहरा समुदाय: महिला जननांग विकृति (FGM) की प्रथा की कानूनी वैधता।

  5. बहिष्कार की प्रथा: धार्मिक समुदायों द्वारा सदस्यों के सामाजिक बहिष्कार की संवैधानिकता।

समयसीमा पर सख्ती और केंद्र का रुख

अदालत ने सुनवाई के दौरान सख्त तेवर अपनाते हुए वकीलों को अतिरिक्त समय देने से इनकार कर दिया है। 21 अप्रैल (आज) को जवाबी दलीलें सुनी जा रही हैं, जिसके बाद एमिकस क्यूरी अपनी अंतिम बहस पेश करेंगे। खास बात यह है कि केंद्र सरकार ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के माध्यम से स्पष्ट किया है कि वह समीक्षा याचिकाओं का समर्थन करती है, जबकि त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने धर्म की 'समुदाय-केंद्रित' व्याख्या करने की अपील की है।