अपनेपन का प्रेम ही होता है सबसे सच्चा प्रेम
जब प्रेम बहुत गहरा होता है, तब तुम किसी भी गलतफहमी के लिए पूरी जिम्मेवारी लेते हो। पल भर के लिए ऊपरी तौर से नाराजगी व्यक्त कर सकते हो, परन्तु जब इस नाराजगी को दिल से महसूस नहीं करते, तब तुम एक-दूसरे को अच्छी तरह समझ पाते हो। तब तुम उस अवस्था में हो जहां सभी समस्याएं और मत-भेद मिट जाते हैं और केवल प्रेम झलकता है। प्राय: हम मतभेदों में उलझे रहते हैं क्योंकि अपने वास्तविक स्वभाव से दूर हो गए हैं।
प्रेम के नाम पर हम दूसरों को इच्छानुसार चलाना चाहते हैं। यह स्वाभाविक है कि जब हम किसी से प्रेम करते हैं तो हम चाहते हैं कि वे त्रुटिहीन हो। तुम पहाड़ी के ऊपर से जमीन के गड्ढों को नहीं देख सकते। इसी प्रकार, उन्नत चेतना की अवस्था से दूसरों की त्रुटियां नजर नहीं आती। परन्तु जमीन आकर गड्ढों को (दोषों को) देख सकते हो। और गड्ढों को भरना चाहते हो तो उन्हें देखना ही होगा। हवा में रहकर तुम घर नहीं बना सकते। गड्ढों को देखे बिना, उनको भरे बिना, कंकड़-पत्थर हटाए बिना, जमीन को नहीं जोत सकते।
इसीलिए जब तुम किसी से प्रेम करते हो और उनमें दोष ही दोष देखते हो तो उनके साथ रहो और गड्ढे भरने में उनकी मदद करो। यही ज्ञान है। तुम किसी को प्यार क्यों करते हो? क्या उनके गुणों के लिए या मित्रता और अपनेपन के कारण? अपनत्व महसूस किए बिना, केवल उनके गुणों के लिए, तुम किसी से प्रेम कर सकते हो!
इस प्रकार का प्रेम प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या पैदा करता है। परन्तु जब प्रेम आत्मीयता के कारण होता है, तब ऐसा नहीं होता। जब तुम किसी को उनके गुणों के लिए चाहते हो और जब उनके गुणों में बदलाव आता है, या जब तुम उनके गुणों के आदी हो जाते हो, तुम्हारा प्रेम भी बदल जाता है। परन्तु प्रेम यदि अपनत्व के भाव से है, क्योंकि वे तुम्हारे अपने हैं, तब वह प्रेम जन्म-जन्मान्तरों तक रहता है।
लोग कहते हैं, मैं ईश्वर से प्रेम करता हूं क्योंकि वे महान है। और यदि यह पाया जाए कि ईश्वर साधारण हैं, हमारे जैसे ही एक व्यक्ति, तब तुम्हारा प्रेम समाप्त हो जाएगा। यदि तुम ईश्वर से इसलिए प्रेम करते हो क्योंकि वे तुम्हारे अपने हैं, तब वे चाहे जैसे भी हों, चाहे वे रचना करें या विनाश, तुम फिर भी उन्हें प्रेम करते हो। अपनेपन का प्रेम स्वयं के प्रति प्रेम के समान है।
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