रीवा के केमिकल-फ्री रंगों की देशभर में डिमांड, मंदिरों के फूलों से बन रहा होली का गुलाल
रीवा। होली का त्योहार आते ही बाजार रंग-गुलाल से सज जाते हैं. कई बार यह रंग केमिकल युक्त होते होने के कारण त्वचा को भारी नुकसान पहुंचाते हैं. लेकिन रीवा में महिलाओं के एक समूह ने एक अनूठी पहल की है. ये महिलाएं मंदिरों से निकलने वाले फूल को इकट्ठा कर लाती हैं और उससे शुद्ध हर्बल कलर और गुलाल बनाती हैं. यह गुलाल लोगों की त्वचा के लिए किसी भी प्रकार से नुकसान नहीं पहुंचाते और होली को न केवल इको फ्रेंडली होली बनाते हैं, बल्कि स्किन फ्रेंडली होली भी बना देते हैं. साथ ही जो फूल मंदिरों से निकलकर रीवा की नदियों को गंदा करते थे. उनका भी सही सदुपयोग हो पा रहा है।
गेंदा, गुड़हल, पलाश और चमेली जैसे फूलों से बनता है गुलाल
गुलाल बनाने के लिए सभी प्रकार के फूलों का उपयोग किया जाता है. मुख्यतः गेंदे, गुड़हल, पलाश और चमेली जैसे फूलों का उपयोग गुलाल बनाने में होता है. शुद्ध गुलाल की डिमांड मध्य प्रदेश के बाहर दिल्ली, बेंगलुरु और हरियाणा जैसे शहरों में भी हो रही है. कहा यह जाता है कि रंगों का त्योहार होली प्रकृति के साथ जुड़ने का उत्सव भी है. बसंत ऋतु में जब पलाश के पेड़ केसरिया फूलों से भर जाते हैं. तब यही फूल होली के रंग बन जाते हैं. यह खुशबूदार फूल हमारी होली को हैप्पी होली बना देते हैं।
केमिकल रंगों से त्वचा और आंखों में एलर्जी
कई बार बाजार में मिलने वाले गुलाल और रंग, रासायनिक पदार्थ से बने होते हैं. इसमें पारा और लेड और सिंथेटिक मिलाए जाते हैं. इसमें त्वचा पर खुजली एलर्जी जलन, यहां तक की आंखों में संक्रमण की भी समस्याएं सामने होती हैं. यह रंग सूखे हुए फूलों को अच्छी तरह से पीस कर बारीक पाउडर बनाने के बाद मलमल के कपड़े या छलनी से छान के महीन पाउडर जो बचता है. उसी से हर्बल का रंग बनता है. इसको शुरू करने वाली अमृता केसरवानी और नम्रता केसरवानी ने विस्तार न्यूज़ से बात करते हुए बताया कि इसकी शुरुआत उन्होंने कई वर्षों पहले की थी. मंदिरों से निकलने वाले फूल नदियों को गंदा करते थे. नदियों को शुद्ध करने और लोगों को शुद्ध हर्बल गुलाल पहुंचाने के उद्देश्य से इसकी शुरुआत हुई. जिसकी डिमांड आज पूरे देश में हो रही है. यह ना केवल इको फ्रेंडली होली, बल्कि स्किन फ्रेंडली होली भी बनाती है।
केसरिया गीला रंग बनाने की विधि
करीब 200 ग्राम ताजे या सूखे टेसू के फूल लें. इन्हें साफ कर लें. 2 लीटर पानी में 10 से 15 मिनट तक उबालें. पानी का रंग गहरा केसरिया हो जाएगा. ठंडा होने के बाद यह प्राकृतिक रंग होली खेलने के लिए तैयार है।
हर्बल गुलाल बनाने का तरीका
सूखे फूलों को अच्छी तरह पीसकर बारीक पाउडर बना लें. इसे मलमल के कपड़े या छलनी से छान लें, ताकि मोटे रेशे अलग हो जाएं. जो महीन पाउडर बचेगा, वही असली हर्बल गुलाल है. यह इको फ्रेंडली होली को बढ़ावा देने के उद्देश्य तैयार किया जा रहे हैं. हर्बल कलर होली को हैप्पी कर रहे हैं और यह रीवा से निकले रंग हर किसी को शुद्ध रासायनिक मुक्त होली के लिए प्रेरित भी कर रहे हैं. इसलिए हर कोई हैप्पी होली कह रहा है।
कृषि, पशुपालन और उद्यम से जुड़ी धरमजयगढ़ की महिलाएं अब स्थानीय बीजों और अनाजों से बना रहीं राखियां
विष्णुभोग चावल बना जीपीएम जिले का गौरव
रेल यात्रियों और मासूम बच्चों की सुरक्षा के प्रति जीआरपी की संवेदनशीलता का उत्कृष्ट उदाहरण
नशे से दूरी है ज़रूरी 2.0" अभियान को प्रदेशभर में मिल रहा जनसमर्थन
अवैध लकड़ी परिवहन पर वन विकास निगम की बड़ी कार्रवाई
मल्हार में खुली छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक की नई शाखा
विश्व कप के रण में मध्यप्रदेश का गौरव: हॉकी इंडिया की विश्व कप टीम में हॉकी अकादमी के एसोसिएट खिलाड़ी विवेक सागर प्रसाद का चयन
मध्यप्रदेश पुलिस की बड़ी कार्रवाई
स्वस्थ पशुधन, समृद्ध किसान: मुंगेली में 582 शिविरों से बदली पशुपालन की तस्वीर
बालोद में असर दिखा रही प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना