नासा ने टाल दिया अपना मून मिशन, अब मार्च में नहीं होगी लॉन्चिंग, जानिए क्या है वजह ?
नई दिल्ली। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (US space agency NASA) ने अपने मून मिशन आर्टेमिस-2 (Moon Mission Artemis-2) की लॉन्चिंग को फिलहाल टाल दिया है। मिशन मार्च में शुरू होने वाला था, लेकिन अब रॉकेट और यान दोनों को लॉन्च पैड से हटा लिया गया है। नासा ने बताया कि इस फैसले का कारण रॉकेट में आई तकनीकी खराबी (Technical Fault) है। विशेष रूप से, स्पेस लॉन्च सिस्टम (SLS) में हीलियम लीक की समस्या आई थी, जिसके कारण मिशन को स्थगित किया गया है। नासा के चीफ जेरेड आइजैकमैन ने शनिवार को बताया कि उनकी टीम के लिए यह निर्णय निराशाजनक था, क्योंकि मिशन के लिए काफी मेहनत की गई थी। उन्होंने कहा, “हम महत्वपूर्ण मिशनों को बहुत सावधानी से संचालित करते हैं। 1960 के दशक में जब नासा ने इतिहास रचा था, तब भी कई बाधाएं आई थीं, और मिशन में देरी हुई थी।”
हीलियम का रॉकेट सिस्टम में महत्व
रॉकेट सिस्टम में हीलियम का अहम रोल होता है। यह प्रोपेलेंट टैंक में प्रेशर बनाए रखता है और इंजन को संचालित करने में मदद करता है। अब एलएलएस रॉकेट और ओरियन अंतरिक्ष यान को मरम्मत के लिए व्हीकल असेंबली बिल्डिंग में भेजा जाएगा।
नासा का मिशन प्लान
नासा का उद्देश्य आर्टेमिस-2 मिशन के दौरान अंतरिक्ष-यात्रियों को शून्य-गुरुत्वाकर्षण में एक छोटे से केबिन में काम करने का अनुभव कराना था। मिशन के दौरान, अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन की तुलना में पृथ्वी की निचली ऑर्बिट में रेडिएशन का स्तर अधिक होगा, लेकिन यह सुरक्षित रहेगा। पृथ्वी पर लौटने के बाद, अंतरिक्ष-यात्री एक ऊबड़-खाबड़ वायुमंडलीय वापसी का अनुभव करेंगे और अमेरिका के पश्चिमी तट के पास प्रशांत महासागर में लैंड करेंगे।
यह मिशन चांद पर लैंडिंग के लिए नहीं था। नासा का कहना है कि आर्टेमिस-2 का मुख्य उद्देश्य आर्टेमिस-3 मिशन के लिए अंतरिक्ष-यात्रियों की चांद पर लैंडिंग की तैयारी करना था। आर्टेमिस-3 मिशन में, नासा का प्लान है कि अंतरिक्ष-यात्री चांद के दक्षिणी ध्रुव पर जाएं, और इसके बाद चांद पर मानवों की निरंतर उपस्थिति स्थापित करने की योजना है।
आर्टेमिस-4 और आर्टेमिस-5 मिशन के तहत चांद के चारों ओर एक स्पेस स्टेशन “गेटवे” का निर्माण किया जाएगा। इसके बाद, चांद पर और लैंडिंग होगी, और गेटवे में अतिरिक्त हिस्से जोड़े जाएंगे। इस कार्यक्रम का उद्देश्य चांद पर स्थायी मानव उपस्थिति बनाना है, जैसा कि नासा ने 1960 और 1970 के दशक के अपोलो कार्यक्रम के दौरान किया था।
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