सिद्दारमैया को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस: चुनावी वादों पर भ्रष्ट आचरण का आरोप
बेंगलुरु। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया को सुप्रीम कोर्ट ने वरुणा सीट से उनके 2023 के चुनाव के खिलाफ दायर एक याचिका पर नोटिस जारी किया है। याचिका वरुणा क्षेत्र के मतदाता शंकरा ने दायर की है, जिसमें निम्नलिखित की मांग की गई है कि सिद्दारमैया का चुनाव रद्द किया जाए। उन्हें अगले छह साल तक चुनाव लड़ने से रोका जाए।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि: 2023 के विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस पार्टी ने अपने घोषणापत्र में जो पांच वादे किए थे, वे मतदाताओं को रिश्वत देने के समान हैं। यह घोषणापत्र सिद्दारमैया की सहमति से जारी हुआ था, इसलिए उन पर भ्रष्ट आचरण का मामला बनता है। इतना ही नहीं याचिकाकर्ता ने इन वादों को भ्रष्ट आचरण बताकर कहा है कि इनसे पुरुषों के साथ भेदभाव हुआ, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। प्रत्येक घर को 200 यूनिट मुफ्त बिजली, प्रत्येक महिला मुखिया को 2,000 रुपए प्रतिमाह, प्रत्येक बीपीएल परिवार के सदस्य को 10 किलो अनाज प्रतिमाह, बेरोजगार ग्रेजुएट्स को 2 साल तक 3,000 रुपए प्रतिमाह, डिप्लोमा धारकों को 1,500 रुपए प्रतिमाह और राज्य में सभी महिलाओं के लिए सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा।
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का रुख
कर्नाटक हाईकोर्ट: अप्रैल में याचिका को यह कहकर खारिज कर दिया था कि चुनाव में किए गए वादे करप्ट प्रैक्टिस (भ्रष्ट आचरण) की श्रेणी में नहीं आते। सुप्रीम कोर्ट (जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच): शुरुआत में बेंच ने याचिका खारिज करने की इच्छा जाहिर की है। हालांकि, अदालत को तमिलनाडु के लंबित मामले (एस. सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु सरकार, 2013) की जानकारी दी गई, जिसमें समान चुनावी वादों को भ्रष्ट आचरण माना जाए या नहीं, इस पर तीन न्यायाधीशों की बेंच के सामने चुनौती लंबित है। इसी कारण, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में भी सुनवाई की अनुमति दी और सिद्दारमैया तथा अन्य पक्षों को जवाब देने के लिए नोटिस जारी किया। यह मामला भारतीय राजनीति और चुनावी नियमों के बीच एक महत्वपूर्ण कानूनी बहस बन गया है। सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई में यह तय होगा कि चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादों को कानूनी रूप से भ्रष्ट प्रैक्टिस माना जा सकता है या नहीं।
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