पितृपक्ष में आटे का दीपक जलाना क्यों माना जाता है सबसे शुभ, जानिए इसके पीछे की मान्यता
जहां दीपक जलता है, वहां अंधेरा टिक नहीं पाता.. कुछ ऐसा ही महत्व है पितृपक्ष में आटे के दीपक का. मान्यता है कि इस समय अपने पूर्वजों को याद करना, उनके लिए श्राद्ध, तर्पण और दान करना बेहद शुभ होता है. माना जाता है कि पितृपक्ष में छोटा सा दीपक भी बड़ी खुशियां ला सकता है.
घर के मुख्य द्वार पर आटे का दीपक जलाने से न सिर्फ पितरों की आत्मा तृप्त होती है, बल्कि घर में सुख-शांति और समृद्धि का भी वास होता है. कहा जाता है कि इस दीपक की लौ से नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है और सकारात्मकता का संचार होता है.
क्या है महत्व
जब मनुष्य इस संसार से चला जाता है तो उसका पंचभौतिक शरीर यानी मांस और हड्डी का शरीर अग्नि को समर्पित कर दिया जाता है, लेकिन उसके बाद जो सूक्ष्म शरीर होता है, जिसे प्रेत शरीर भी कहा जाता है, उसकी तृप्ति के लिए आटे के अंदर पिंड बनाकर विशेष प्रक्रिया की जाती है. इसी कारण से आटे के दीपक को पितृपक्ष में खास महत्व दिया गया है.
आटे के दीपक से पितृ होते हैं प्रसन्न
स्वामी जी का कहना है कि भादो पूर्णिमा से लेकर अश्विन अमावस्या तक के 16 दिनों को पितृपक्ष कहा जाता है. मान्यता है कि इन दिनों हमारे पूर्वज धरती पर आते हैं और अपने वंशजों से मिलने उनके घर-आंगन तक आते हैं. ऐसे में यदि उनके स्वागत में आटे का दीपक जलाया जाए, तो पितर बेहद प्रसन्न होते हैं.
महंत स्वामी कामेश्वरानंद का कहना है कि दीपक हमेशा घर के मुख्य द्वार पर जलाना चाहिए. सबसे शुभ माना जाता है अगर दीपक पूरब या उत्तर दिशा की ओर मुख करके जलाया जाए लेकिन अगर घर का गेट किसी और दिशा में है तो वहीं दीपक रखा जा सकता है. यह दीपक शाम के समय जलाना उत्तम होता है. उनका कहना है कि मिट्टी के दीपक की तुलना में पितर आटे के दीपक से ज्यादा खुश होते हैं, क्योंकि आटे को ही पिंड का रूप माना गया है. नरम आटे से बना दीपक उनके सूक्ष्म शरीर को अधिक भाता है.
क्या होता है फायदा
आटे के दीपक की लौ सिर्फ रोशनी ही नहीं फैलाती बल्कि यह मान्यता भी है कि इससे घर में लड़ाई-झगड़े दूर होते हैं. पति-पत्नी के रिश्ते मधुर होते हैं और वंश की वृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है. यानी छोटा सा दीपक पूर्वजों की आत्मा को तृप्त कर देता है और परिवार के लिए खुशहाली का संदेश लेकर आता है. यही कारण है कि पितृपक्ष में आटे का दीपक जलाने की परंपरा आज भी उतनी ही आस्था और श्रद्धा से निभाई जाती है.
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