राजस्थान के इस मंदिर में अब नहीं चढ़ेंगे नारियल-मखाने, मंदिर समिति ने लगाई रोक
राजस्थान के नागौर जिले के बुटाटी गांव स्थित संत चतुरदास महाराज मंदिर में अब से नारियल, मखाना, मिठाई और नकली चांदी से बने मानव अंगों के प्रतीक को चढ़ाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. मंदिर विकास समिति ने यह फैसला मंदिर की पवित्रता बनाए रखने और श्रद्धालुओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए लिया है. मंदिर विकास समिति के अध्यक्ष देवेंद्र सिंह ने बताया कि श्रद्धालु जो नारियल लेकर आते हैं, वे कई बार अंदर से सड़े-गले या कीड़ों से भरे होते हैं.
उन्होंने बताया कि जब ऐसे नारियल हवन-कुंड में चढ़ाए जाते हैं तो यज्ञ-हवन की शुद्धता भंग होती है. इसलिए अब से मंदिर में सिर्फ नारियल गट (गोटा) ही चढ़ाने की अनुमति होगी. इसी तरह, बाजार में मिलने वाले केमिकल युक्त मखानों को भी प्रतिबंधित किया गया है. बताया गया कि यह मखाने स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं, विशेषकर उन मरीजों के लिए जो पैरालिसिस जैसी गंभीर बीमारियों से ग्रसित होकर बुटाटी धाम पर मन्नत मांगने आते हैं.
कौन हैं संत चतुरदास जी महाराज
राजस्थान के नागौर जिला मुख्यालय से 50 किमी बुटाटी गांव को चमत्कारी गांव कहा जाता है. इस गांव में संत चतुरदास महाराज का मंदिर मौजूद है, जिसे बुटाटी धाम के नाम से जाना जाता है. यहां पर लकवा ग्रस्त मरीजों का चमत्कारिक ढंग से इलाज होता है. बुटाटी धाम संत श्री चतुरदास महाराज के जप-तप व कारीगरों के कर्म कौशल के रूप में दुनियाभर भर में ख्याति पा चुका है. बुटाटी धाम आस्था का बड़ा केन्द्र बना हुआ है. देश ही नहीं बल्कि विदेशी लोग भी मानते हैं कि इस मंदिर में आने और पूजा-अर्चना करने से लकवा ग्रस्त मरीज पूरी तरीके से ठीक हो जाते हैं. यहीं, कारण है कि इस मंदिर में विदेशी लोगों को भी आसानी से देखा जा सकता है.
चतुरदास महाराज मंदिर से जुड़ी मान्यताएं
मान्यता है बाबा की तपोस्थली में सप्तदिवसीय परिक्रमा व धूणे की भभूत मात्र से लकवे जैसा असाध्य मर्ज दूर हो जाता है. गौरतलब है कि बाबा ने करीब 300 साल पहले बुटाटी गांव में संत चतुरदास महाराज ने पवित्र स्थल पर जीवित समाधि ली थी. धीरे-धीरे आस्था बढ़ने लगी और बाबा के प्रति लोगों की श्रद्धा भी बलवती होती गई. तब से आज तक लगातार इस चमत्कारी धूणे पर अनगिनत श्रद्धालु परिक्रमा करने के साथ मस्तक पर भभूत लगाकर असाध्य बीमारी से ठीक हुए हैं. मंदिर के पुजारियों के अनुसार, लकवा ग्रस्त मरीजों को यहां 7 दिन तक रखा जाता है. जिसके बाद मरीज लगभग ठीक हो जाते हैं.
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