शिंदे के जय गुजरात कहने पर भड़की शिवसेना, इसे मराठी अस्मिता के खिलाफ बताया
मुंबई। महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे ने पुणे में जैसे ही ‘जय हिंद, जय महाराष्ट्र, जय गुजरात’ का नारा लगाया, वैसे ही राजनीतिक भूचाल आ गया। विपक्ष ने इसे मराठी अस्मिता के खिलाफ बताया है। आदित्य ठाकरे ने इसे बीजेपी की गुलामी बताया है। वहीं शिवसेना (यूटीबी) के सांसद संजय राउत ने कहा कि महाराष्ट्र की धरती पर ‘जय गुजरात’ का नारा पहले कभी नहीं सुना गया। विवाद बढ़ा तो शिंदे ने सफाई दी।
बता दें एकनाथ शिंदे गुजरात समुदाय के कार्यक्रम में पहुंचते ही कहा ‘जय गुजरात’। देवेंद्र फडणवीस ने समर्थन करते हुए कहा कि शरद पवार ने भी कभी कर्नाटक में ‘जय कर्नाटक’ कहा था, लेकिन यह सफाई शिवसेना (यूबीटी), कांग्रेस और मनसे को रास नहीं आई। अब सवाल उठने लगे कि क्या महाराष्ट्र में गुजरात का प्रभुत्व बढ़ रहा है। इसका जवाब सिर्फ राजनीति में नहीं, इतिहास और सामाजिक चेतना में भी छिपा है। बॉम्बे (मुंबई) की पहचान को लेकर मराठी राजनीति हमेशा असहज रही है। क्योंकि हकीकत यह है कि इस शहर को पारसियों, मुसलमानों और गुजराती व्यापारियों ने बनाया है। महाराष्ट्रीय समाज का परंपरागत केंद्र पुणे और नागपुर रहे हैं। बंबई यानी अब मुंबई तो आर्थिक राजधानी बनी लेकिन संस्कृति में मिश्रित। 1960 में महाराष्ट्र बना और मुंबई उसकी राजधानी बनी, लेकिन तब भी मुंबई पर महाराष्ट्र का अधिकार विवादित रहा। 1966 में बाल ठाकरे ने शिवसेना बनाई। उद्देश्य था कि मुंबई में मराठी लोगों को नौकरी मिले। शुरुआती हमला दक्षिण भारतीयों पर हुआ, फिर उत्तर भारतीयों पर। बाद में शिवसेना ने गुजराती और मारवाड़ी व्यापारियों को भी निशाना बनाया। मराठी अस्मिता की राजनीति यहीं से शुरू हुई।
अब जब एकनाथ शिंदे ‘जय गुजरात’ बोलते हैं, तो शिवसेना को यह केवल एक नारा नहीं लगता। यह प्रतीक बन जाता है उस खतरे का, जिसमें उन्हें लगता है कि मुंबई फिर बाहरी लोगों के हाथ में जा सकती है। इसलिए यह मामला भावनाओं से जुड़ा है। उद्धव ठाकरे पहले भी आरोप लगा चुके हैं कि मोदी और शाह गुजरात को बाकी भारत से ऊपर रख रहे हैं। वे कहते हैं कि पीएम मोदी की हर योजना का केंद्र गुजरात होता है। चाहे वेदांता-फॉक्सकॉन हो या एयरबस प्रोजेक्ट, कई बड़े निवेश महाराष्ट्र से गुजरात चले गए। यह आक्रोश अब सड़कों पर नजर आ रहा है।
राज ठाकरे ने भी कभी उत्तर भारतीयों के खिलाफ ऐसा ही आंदोलन चलाया था। अब उनके लिए नया निशाना गुजराती समुदाय बन सकता है, क्योंकि महाराष्ट्र में गुजराती व्यापारी काफी प्रभावशाली हैं। मुंबई, ठाणे, नासिक जैसे शहरों में उनकी आर्थिक पकड़ है। राजनीति में उन्हें घेरना आसान और फायदेमंद हो सकता है।
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